RCEP में भारत के शामिल न होने की पांच बड़ी वजहें जो जाननी ज़रूरी हैं

पिछले दस सालों में चीन का भारत के साथ करीब 750 बिलियन डॉलर का ट्रेड डेफिसिट हुआ और रूल्स ऑफ ओरिजन भी साफ नहीं थे साथ ही नॉन टैरिफ बैरियर्स भी बढ़े हुए थे. जानिए इन सभी वजहों को.

वैश्विक व्यापार में कुछ जटिल मुद्दों की वजह से भारत ने RCEP समझौते में शामिल होने से आखिरी समय पर इंकार कर दिया.  जानिए वो सभी कारण और उनके उपाय.  

भारत रीजनल कॉम्प्रीहेंसिव इकॉनमिक पार्टनरशिप (RCEP)में शामिल 15 देशों में से 11 के साथ  पहले ही व्यापार घाटा झेल रहा है. भारत ने वैश्वीकरण में शामिल होते हुए भी घरेलू स्तर पर अपने हित सामने रखते हुए मांग थी कि इस व्यापार घाटे को कम करने की ठोस उपाय किए जाएं. 

भारत ने जापान, साउथ कोरिया, आसियान फ्री ट्रेड एरिया या, कॉम्प्रिहेंसिव इकॉनॉमिक एग्रीमेंट साइन किया था. लेकिन इन देशों से साथ भारत का आयात बढ़ा लेकिन निर्यात नहीं बढ़ा. इससे भारत को नुकसान हुआ.

भारत यह चाहता था कि निर्यात को सुधारने का भरोसा दिया जाए.बहुत सारे रेसेप देश भी भारत द्वारा निर्यात की जाने वाले वस्तुओं और सेवाओं पर कई तररह की पाबंदियां लगाते हैं.  

टैरिफ बैरियर्स और नॉन टैरिफ बैरियर्स 

वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइज़ेशन में शामिल हुए देशों को आपस में आयात होने वाली वस्तुओं पर आयायित वस्तुओं पर टैरिफ को कम करना होता है और साथ ही व्यापार को आसान भी बनाना होता है.

लेकिन बहुत से देश डब्लूटीओ के समझौते का पालन नहीं करते हैं. जैसे चीन बहुत से नॉन टैरिफ बैरियर्स का प्रयोग करके भारत को रोकता रहा है. पिछले दस सालों में चीन का भारत के साथ करीब 750 बिलियन डॉलर का ट्रेड डेफिसिट हुआ, जो पिछले साथ करीब 65 बिलियन डॉलर का रहा.

चीन द्वारा भारत पर लगाए गए नॉन टैरिफ बैरियर्स के उदाहरण के तौर पर, जैसे भारत के  फार्मास्यूटिकल और आईटी सॉफ्टवेयर प्रोडक्ट्स पूरी दुनिया में मशहूर हैं लेकिन चीन भारत से फार्मास्यूटिकल प्रोडक्ट्स प्राक़तिक चिकित्सा का बहाना देकर आयात नहीं करता है लेकिन यूरोप से ज्यादा दाम देकर फार्मास्यूटिकल प्रोडक्ट्स खरीदता है. जबकि भारत के सॉफ्टवेयर्स को सुरक्षा का हवाला देकर आयात नहीं किया जाता है. 


सर्विस इंडस्ट्री को बढ़ावा न देना

भारत  ने यह सवाल किया था कि कैसे सर्विस इंडस्ट्री को इस समझौते में जोड़ा जाएगा. भारत के लिए सर्विस इंडस्ट्री एक बड़ी स्ट्रेंथ है जबिक RCEP में शामिल बाक़ी देशों का ज़ोर केवल वस्तुओं पर था. डब्लूटीओ ने भी कहा था कि भारत अपना आर्थिक विकास सर्विस इंडस्ट्री को बढ़ावा देकर कर सकता है. भारत इस बात का आश्वासन चाहता था कि सर्विस इंडस्ट्री को बढ़ावा मिले. 

डब्लूटीओ के रूस ऑफ ओरिजन के नियमों को लेकर भी भारत को कोई साफ जवाब नहीं मिला था.

रूल्स ऑफ ओरिजन यह कहता है कि अगर कोई देश अपने उत्पाद के लिए मार्केट नियमों से आगे जाकर कच्चे उत्पाद, बिजली, ज़मीन या कीमतों के निर्धारण पर सब्सिडीज़ देते हैं तो उनके उत्पादों पर डंपिंग ड्यूटी लगती है.

लेकिन बहुत से देश इस डंपिंग ड्यूटी से बचने से लिए किसी और देश में अपनी कंपनियों के उत्पाद बना कर किसी और देश में बेचते हैं, जैसे चीन लाओस में बहुत सा सामन बना कर भारत में बेच रहा था, जिससे रूल्स ऑफ ओरिजन के नियमों में पारदर्शिता नहीं रहती है. यह भारत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए खतरा बन रहा था लेकिन भारत को इस समस्या का समाधान नहीं मिल रहा था.   

किसानों को होने वाला नुकसान और  इकॉनमिक बैलेंस 


भारत अगर RCEP के वर्तमान स्वरूप में समझौता करता तो  डेरी उद्योग को नुकसान पहुंच सकता था. न्यूजीलैंड को जबकि इसका फायदा होता. मैन्यूफैक्चरिंग में चीन को फायदा होता और पाम ऑइल के क्षेत्र में मलेशिया को. लेकिन भारत के किसान फिलहाल इसके लिए तैयार नहीं थे. भारत का घरेलू बाजार पहले ही नुकसान में है इसे देखते हुए भारत ने समझौता करना फिलहाल ठीक नहीं समझा. 

RCEP के बाक़ी देशों का एक दूसरे के साथ से व्यापार घाटा उतना बड़ा नहीं है, जितना भारत के साथ था.  इस कारण बाक़ी 15 देश इस फ्री ट्रेड समझौते के लिए राजी हुए. जापान, साउथ कोरिया, आसियान और चीन अगर आपस में कृषि वस्तुओं का व्यापार करते हैं तो उनपर टैरिफ ज्यादा नहीं है, या इंवेस्टमेंट या इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश या किसी और तरह से वो लोग एक दूसरे को कॉम्पेनसेट करते हैं,. लेकिन भारत में ऐसा नहीं है.

अगर भविष्य में बाकी RECP देश भारत में निवेश बढ़ाते हैं, या पीपल टु पीपल कॉन्टेक्ट बढ़ाते हैं या पर्यटन को बढ़ावा देते हैं या भारत में मैन्युफैक्चरिंग इकाइयां खोलते हैं तो बहुत कुछ इकॉनॉमिक बैलेंस हो सकता है.  

भारत का बड़ा बाजार है. अपनी जीडीपी का 59% घरेलू बाजार में ही खप जाता है. बाक़ी देश जो हालिया वैश्विक मंदी से उबरना चाहते हैं वो भारत के बाजार के अवसर खोना नहीं चाहेंगे. उनके लिए भारत को नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं होगा. आने वाले एक-दो सालों में हो सकता है परिस्थितियां बदलें और RCEP देश भारत की चिंताएं समझ कर झुकें और भारत भी इस समझौते में शामिल हो. 

(एशियाविल हिंदी की वर्तिका से हुई बातचीत के आधार पर) 

Source:

Football

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