क्या देशभक्ति के नाम पर वोट बटोरने की कोशिश हो रही है ?

बालाकोट हमले के बाद भी क्यों पुलवामा जैसे हमले की तरह बाक़ी घटनाओं में सुरक्षा बलों की जानें जा रही हैं. आज हमें चौकस रहने की ज़रूरत है. देश की एकता-अखंडता को मज़बूत करने की ज़रूरत है. लेकिन जो आतंकवादियों का उद्देश्य है, हम उसी जाल में फंसते जा रहे हैं.

पुलवामा हमले के ख़िलाफ़ पूरा देश और सभी राजनीतिक पार्टियों ने एकजुट होकर लड़ने का संकल्प लिया. ये लड़ाई भारत और आतंकवाद के बीच में है, लेकिन अफ़सोस की बात ये है कि सरकार और एक ख़ास पार्टी की तरफ़ से भारत की इस एकता को तोड़ने की कोशिश हो रही है.

कहीं कश्मीरियों पर हमले हो रहे हैं, तो कहीं किसी एक क़ौम को निशाने पर लिया जा रहा है. इस तरह हम देखें तो जो आतंकवादी चाहते हैं कि हमारे देश के लोगों के बीच फूट पैदा हो, हम उसी जाल में फंस रहे हैं. लेकिन राजनीतिक स्वार्थ के लिए अगर ऐसा हो रहा है तो बहुत ख़तरनाक साबित होगा.


आतंकवाद से लड़ने के लिए देश में एकता की ज़रूरत है और अगर इस एकता को कोई तोड़ने की कोशिश कर रहा है तो हमें सतर्क रहना पड़ेगा. पुलवामा के बाद बालाकोट पर हमारी वायुसेना ने हमला किया. सबने सलाम किया. लेकिन, इसके बाद किस तरह के बयान आए? बीजेपी अध्यक्ष ने कहा कि 250 मारे गए, एक केंद्रीय मंत्री ने कहा कि एक भी नहीं मरा और मारना भारत का इरादा भी नहीं था. गृहमंत्री ने कहा कि हमले से पहले 300 मोबाइल वहां चालू थे, अब वो चालू नहीं है तो इसका मतलब ये है कि 300 लोग वहां मारे गए. एक और मंत्री ने कहा कि 300 नहीं, 400 मरे. 


एयरफोर्स ने अपना काम किया. बाद में हमारा एक पायलट उस तरफ़ पकड़ा गया. उनकी भी रिहाई हुई. पूरी दुनिया का पाकिस्तान पर दबाव था. इसके बाद इस तरह की बातें कहने का क्या मतलब है? देश की एकजुटता को मज़बूत करने के बजाए चुनावी फ़ायदे के लिए इसका राजनीतिकरण करना घातक है. 


बालाकोट हमले के दिन ही प्रधानमंत्री ने ख़ुद पुलवामा हमले में मारे गए 40 जवानों की तस्वीरों का चुनावी इस्तेमाल किया. सरकार का काम इन हमलों पर वोट बटोरना नहीं है, बल्कि उसका काम है चौकस रहना. जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल ने ख़ुद कहा कि इंटेलिजेंस इनपुट के बावजूद लापरवाही बरती गई. इसका ज़िम्मेदार कौन है? कैसे हुआ हमला? बालाकोट हमले के बाद भी क्यों पुलवामा जैसे हमले की तरह बाक़ी घटनाओं में सुरक्षा बलों की जानें जा रही हैं. आज हमें चौकस रहने की ज़रूरत है. देश की एकता-अखंडता को मज़बूत करने की ज़रूरत है. लेकिन जो आतंकवादियों का उद्देश्य है, हम उसी जाल में फंसते जा रहे हैं.

सरकार राष्ट्रवाद की भावना को भड़काकर अपने चुनावी फ़ायदे के लिए इसलिए इस्तेमाल करना चाहती है क्योंकि लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर बड़ा हमला हुआ है. सरकार की आर्थिक नीतियों का व्यापक विरोध हो रहा है. इसलिए बड़े-बड़े जनांदोलनों से लोगों का ध्यान हटाकर राष्ट्रवाद की तरफ़ मोड़ा जा रहा है. 


दूसरी बात, अब तक रफ़ाल जैसे जितनी भी घटनाएं हुई हैं सरकार उसको दबाकर रखना चाहती है. इसलिए सरकार कह रही है कि देशभक्ति की भावना को मज़बूत करो. रफ़ाल पर सवाल को देश की सुरक्षा पर सवाल बता दिया जाता है. ये सरासर ग़लत है. 


रफ़ाल पर जब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही थी तो सरकार ने कह दिया कि दस्तावेज़ चोरी हो गई. आपको अदालत में ही इस चोरी की याद क्यों आई? अगर चोरी हुई तो अब तक आपने एफ़आईआर दर्ज क्यों नहीं कराया था? इतना महत्वपूर्ण दस्तावेज़ अगर चोरी हो गया तो इसका ज़िम्मेदार कौन है? सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया था कि चोरी हो या ना हो, सवाल ये है कि उस दस्तावेज़ में जो तथ्य हैं वो सही है या ग़लत? 


अमेरिका का वाटरगेट कांड याद कीजिए. तब राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने अख़बार को कहा था कि आप ऐसी चीज़ें नहीं छाप सकते. लेकिन वहां के सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के फ़ैसले को पलट दिया. निक्सन को इस्तीफ़ा देना पड़ा था. ये दुनिया भर में उसूल है. सच्चाई छुपाने के लिए सरकार सुप्रीम कोर्ट में कुछ भी दलील दे रही है. सरकार की इन दलीलों के चलते ही ऐसा लगता है कि रफ़ाल में घोटाला है. इसलिए सरकार इसे दबाना चाहती है. 


हमने जेपीसी की मांग की, लेकिन अब तो चुनाव तक संसद सत्र भी नहीं चलेगा. सरकार अगर ईमानदार है तो रफ़ाल पर श्वेतपत्र लाए और देश को सच्चाई बता दे. दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा. 


वामपंथी पार्टियां जनता के मुद्दे उठा रही है. देश में अन्नदाताओं की आत्महत्या की संख्या बढ़ रही है. नौजवान रोज़गार के सवाल पर दिल्ली में आकर मोदी साहब से सवाल पूछ रहे हैं. प्रदर्शन कर रहे हैं. मोदी जी ने हर साल 2 करोड़ नौकरी का वादा किया था. इस हिसाब से अब तक 10 करोड़ लोगों को रोज़गार मिल जाने चाहिए थे, लेकिन सीएमआईई की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि देश में बेरोज़गारी दर 7.2 फ़ीसदी हो गई. 


नोटबंदी का अर्थव्यवस्था पर जो असर पड़ा उसके बाद 1.10 करोड़ लोगों की छंटनी हो चुकी है. छंटनी का सीधा मतलब यही है कि जो रोज़गार में थे वो बेरोज़गार हो गए. उनकी नौकरियां छिन गईं. मज़दूर 18,000 रुपए न्यूनतम वेतन की मांग कर रहे हैं.


आप इसी साल का हिसाब देख लीजिए. इस वित्त वर्ष में जीडीपी वृद्धि दर बीते पांच साल में सबसे कम रही. सबसे ख़तरनाक ये है कि आख़िरी तीन महीनों में ये और भी घटा. साफ़ है कि हमारी अर्थव्यवस्था आज संकट में है. 


इसी के विरोध में जनांदोलन हो रहे हैं और सरकार उससे ध्यान हटाने के लिए देशभक्ति जैसे जज़्बाती मुद्दे सामने रख रही है. लेकिन, सरकार कितनी भी कोशिश कर ले, कितनी भी भावना भड़का ले, जो व्यक्ति वोट डालने जाता है वो यही देखेगा कि पांच साल में उसकी ज़िंदगी बेहतर हुई या बदतर. इसलिए जज़्बात के आधार पर वोट बटोरने की कोशिश नहीं चलेगी.

सोर्स:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *