गुजरात मॉडल: भरूच में खेतीकि और गौचर की जमीन पर, खदानकी मंजूरी, पर्यावरण की मंजूरी कैसे जारी हुइ?

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भरूच: सभी विभाग के अधिकारियों कि कार्यप्रणाली देखकर लगता है उक्त प्रदेश में खनन  कारोबारियों कि चांदी होती रही है और जब तक प्रशासन, कुम्भकर्णी निंद्रा में मग्न अधिकारियों कि विभाग से पूरी तरह छुट्टी नहीं करती, तब तक अनियमितताओं में कमी कि कामना बेमानी है।

खेर इस वक्त सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत में कही भी ऐसा कोई राज्य है, जहां विभाग के अधिकारियों द्वारा किसी को (ऐग्रीकल्चर) खेती कि जमीन में खनन  का लाइसेन्स/रोयल्टी जारी किया हो? क्या किसी ने किसी राज्य में अब तक खेती कि जमीन में, खदाननो को देखा है? तो इन दोनों सवालों का जवाब होगा नहीं। क्यो कि यह तो नामुमकिन है कि कोई खेती कि जमीन पर खनन के कारोबार का व्यवसाय करें, और वह भी विभाग कि स्वीकृति लेकर। लेकिन यह सब भरूच जिल्लेके ज़गदिया तालुकेमे मुमकिन हो चुका है।

भरूच में 73AA खेती कि एवं गौचर की जमीन पर एक नहीं बल्कि कई खडानोका मामला सामने आया है। जिसमे से पहला है पदाल, दूसरा है भिम्पोर और तीसरा है भिम्पोर। अब इन तीनों के अलावे भरूच जिल्ले के ज्ज़गदिया तहसील में और कितनि खदाने खेती कि जमीन पर चल रहे है यह तो खान एवं खनिज विभाग को पता करना चाहिए। वैसे खेती कि जमीन पर चल रही खदानों को लेकर,

क्रांति भास्कर ने दिनांक 30-05-2017 को एक प्रमुखता से खबर प्रकाशित कि थी।

लेकिन उक्त खबर के बाद जहां एक तरफ जनता अब कलेक्टर श्री भरूच से तरह तरह के सवाल कर रही है वही दूसरी तरफ अधिकारियों अभी भी ऐसे हाथ पर हाथ धरे मुद्रा से बैठे है जैसे कि वह किसी कुम्भकर्णी निंद्रा में मग्न हो। अब यह विभाग के अधिकारियों कि निंद्रा कब खुलेगी? यह सवाल भी फन उठाए है? क्यो कि उक्त तीनों खदाने पर अब तक कोई योग्य कार्यवाही नहीं देखने को मिली, जो कार्यवाही हुई है वह सिर्फ दिखने के लिए ही की गयी है।

  • इन  विभाग के अधिकारियों ने किस लालच/दबाव/मज़बूरी में , खेती कि जमीन में पर्या वरण की मंजूरी जारी कि?
  • किस अधिकारी द्वारा उक्त खदानों की मंजूरी जारी कि?

अब कार्यवाही क्यो नहीं हुई यह सवाल तो जनता कर ही रही है साथ ही साथ जनता यह भी जानना चाहती है यह नामुमकिन कैसे मुमकिन हुआ? यह  वसभी विभाग के अधिकारियों ने किस लालच/दबाव/मज़बूरी में , इस नामुमकिन को मुमकिन किया? और किस अधिकारी द्वारा उक्त तीनों खदानो के रोयल्टी एवम पर्यावरण की मंजूरी जारी हुई? इन तीनों सवालों का जवाब तो जांच के बाद ही मिल सकता है लेकिन जांच कब होगी और होगी भी या नहीं यह? इस सवाल का जवाब तो गुजरात सर्कार को स्वय देना चाहिए। क्यो कि वही इस विभाग के मुख्या है।

  • खेती/गौचर  कि जमीन पर खदान और पर्यावरण की मंजूरी कैसे जारी हुआ, रॉयल्टी रजिस्ट्रेशन कैसे हुआ?

वैसे बताया जता है कि खादंकी मंजूरी जारी करने कि एक लम्बी प्रक्रिया होती है। जिसमे लिज के लिए आवेदन करने वाले से खदान एवम पर्यावरण विभाग के अधिकारी आवेदन के साथ साथ कई दस्तावेज़ और जनकारियाँ मांगते है। उसके बाद मंजूरी जारी करने के पहले विभाग के अधिकारी उस स्थल का निरक्षण भी करते है जहां वह खदान/पर्यावरण मंजूरी जारी करने वाले है। उस जमीन पर खदान के योग्य परिस्थिति है या नहीं, जमीन एन-ए है या नहीं, एसी कई बातों का ध्यान रखा जाता है और उसके बाद पर्यावरण मंजूरी जारी किया जाता है। लेकिन उक्त खदानो की मंजूरी  खेती/गौचर  कि जमीन पर देख कर लगता है कि इन विभाग के अधिकारियों ने उक्त मामले में काफी बड़ा भ्रष्टाचार किया है, अन्यथा छोटी से छोटी कमी का हवाला देकर मंजूरी ना देने वाले अधिकारी भला खेती कि जमीन में बिना रिश्वत लिए लाइसेन्स जारी कर दे दे यह बात जनता के लिए हज़म करनी मुश्किल है। अगर रिश्वत नहीं ली है तो क्यू ऐसा किया गयाहै, यह सवाल लोगोके जहाँ में चल रहे है

खेर जो हो चुका है उसे विभाग के अधिकारी तो बदल नहीं सकते, लेकिन अब मामले में नियमानुसार कार्यवाही कर, यह अवश्य साबित कर सकते है कि यह सब कुछ अंजाने में हुआ और विभाग के किसी अधिकारी ने इस मामले में कोई रिश्वत नहीं ली। और यदि विभाग के अधिकारी ऐसा नहीं करते तो उन्हे गिनीज़ बुक में अपने नाम दर्ज करवाने से कोई नहीं रोक सकता, क्यो कि मामला दूध बेचने का नहीं है मामला खदानोका है।

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