नीतिगत नाकामी से बचाव सेना का काम नहीं, अलर्ट नहीं एक्शन होना चाहिए

जम्मू-कश्मीर में अब तक के सबसे खूंखार आतंकवादी हमले के तार पाकिस्तान से जुड़ते हैं। यह कोई नई बात नहीं रही। यह तथ्य भी भारतीय समझने लगे हैं कि हमारी खुफिया एजेंसियां अन्तर्यामी हैं। वे हर हमले से पहले संबंधित राज्य और सुरक्षा तंत्र को आगाह कर देती हैं। हमले के बाद वे कुछ इस तरह मीडिया को यह जानकारी देती हैं जैसे कोई श्रेय ले रही हों। गलती तो संबंधित राज्य अथवा पीड़ित पक्ष की होती है, जो वह बचाव नहीं कर पाता। निष्कर्ष यही है कि हमले होते रहेंगे। गुप्तचर उससे पहले चेतावनी देते रहेंगे। हम असहाय देखते रहेंगे।सवाल यह है कि भारत इन वारदातों को समय रहते क्यों नहीं रोक पाता? सेना और अर्ध सैनिक बल सिर्फ़ अपनी ताकत दिखा सकते हैं। उसके अलावा उनकी क्या भूमिका हो सकती है? वे हर मर्ज की दवा नहीं हो सकते। ताकत के बल पर आप जंग जीत सकते हैं लेकिन जहां मुकाबला कूटनीति और कुचक्र भरी अंतर्राष्ट्रीय राजनीति से हो, वहां हथियार और सैनिक बल काम नहीं आते। वहां सरकार को अपनी बिसात बिछानी होती है और इसमें नाकामी घोर शर्म तथा चिंता की बात है। सेना और सुरक्षा बल, कूटनीति, विदेश नीति और राजनीतिक मोर्चे पर विफलता से बचाव नहीं कर सकते।

एक उदाहरण ही पर्याप्त होगा। ध्यान दीजिए दो महीने पहले पाकिस्तान दिवालिया हो रहा था। जर्जर अर्थव्यवस्था ने उसकी हालत भिखारियों जैसी कर दी थी। प्रधानमंत्री इमरान खान के लिए करो या मरो की स्थिति थी। इसलिए पद संभालते ही इमरान सऊदी अरब की शरण में गए। सऊदी अरब ने 12 अरब डॉलर की सहायता मंजूर कर दी। अब तक तीन अरब डॉलर पाकिस्तान के खाते में आ चुके हैं। पांच राज्यों वाले मुल्क के लिए तो यह मालामाल करने वाली रकम है। इमरान खान की पार्टी ने खैबर पख्तूनख्वा सूबे में पाकिस्तानी तालिबान के मुखिया हक्कानी को मदरसों के नाम पर 30 लाख डॉलर की मदद दी थी। यह पैसा अमेरिकी था। हक्कानी नेटवर्क भारत विरोधी है और कश्मीर में हिंसक गतिविधियों को मदद करता रहा है। जब भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक की थी तो इमरान खान ने खुला बयान दिया था कि पाकिस्तान इसका बदला लेगा और भारत को बताएगा कि इसका उत्तर कब और किस तरह देना है।

सऊदी अरब भारत से अच्छे रिश्ते रखते होते हुए भी हमेशा कश्मीर के मामले में पाकिस्तान को खुला समर्थन देता रहा है। अच्छे संबंधों का आधार कारोबारी रहा है। भारत जिन देशों से क्रूड ऑइल आयात करता है, उन देशों की सूची में सऊदी अरब हर दम पहले नंबर पर रहा है। सर्वाधिक कारोबार के कारण ही सऊदी अरब ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 2016 में अपने देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया था। लेकिन पिछले साल भारत ने सऊदी अरब से पहला स्थान छीन कर उस पर इराक को बिठा दिया। इराक से 21 मिलियन टन तेल आयात बढ़ाया गया और सऊदी अरब  से 2 मिलियन टन कम किया गया। जाहिर है यह स्थिति सऊदी अरब को पसंद नहीं आनी थी। उसका एकाधिकार टूट गया था। इमरान खान ने इस मानसिकता का फायदा उठाया और आर्थिक मदद ले ली। जानकार मानते हैं कि यही पैसा आतंकवादियों को मिल रहा है और पुलवामा संहार की साजिश में इसका उपयोग किया गया है।
 एक समीकरण और उभरता है। सऊदी अरब और ईरान के बीच रिश्तों में भारत-पाकिस्तान की तरह स्थायी तनाव रहता है। इसका भी भारत ने ख्याल नहीं रखा। एक तरफ हमने सऊदी को तेल आयात के मामले में पहले स्थान से उतारा तो उसके प्रतिद्वंदी ईरान पर निर्भरता बढ़ा दी। पांच बरस में 11 मिलियन टन से बढ़ाकर 22.59 मिलियन टन कर दिया गया। ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध और सऊदी अरब के अमेरिका से मधुर रिश्तों का हम कूटनीतिक ख्याल नहीं रख सके।

यह सच है कि पाकिस्तान में चीनी मदद से बने ग्वादर बंदरगाह के जवाब में ईरान का चाबहार एयरपोर्ट भारत के लिए शक्ति संतुलन का काम करता है और भारत की प्राथमिकता में ईरान को महत्त्व दिया जाना जरूरी था। ऐसे में भारत सऊदी अरब को तेल आयात में अव्वल दर्जे पर रख कर इराक, वेनेजुएला, नाइजीरिया और संयुक्त अरब अमीरात से कटौती कर सकता था। इन देशों से भी भारत तेल आयात करता है। फिलहाल इन छोटे मुल्कों से भारत को कोई खतरा नहीं है। पाकिस्तान ने इस मामले में कूटनीतिक कामयाबी हासिल की है।

इसके अलावा पाकिस्तान ने हाल ही में अमेरिका से भी संबंध सुधारे हैं। ईरान पर प्रतिबन्ध लगाने के बाद अमेरिका के इशारे पर भारत ने तेल आयात बंद नहीं किया। भारत का हित भी इसी में था। लेकिन इससे अमेरिका खफा है। भले ही उसने भारत को छूट दी हो, लेकिन हमें यह तथ्य ध्यान में रखना चाहिए था कि पाकिस्तान अमेरिका के करीब न आ सके। बीते दिनों पाकिस्तान ने अफगानी तालिबान और अमेरिका को शान्ति समझौते की मेज पर साथ लाने का काम किया है। इसमें उसने भारत को अलग थलग कर दिया था। अमेरिका इससे खुश है क्योंकि अफगानिस्तान में उसकी हालत सांप-छछूंदर जैसी हो गई है। उसे इज्जत से अपने सैनिकों की वापसी का बहाना चाहिए। यह बहाना पाकिस्तान ने उसे दे दिया है। अमेरिका भले ही पुलवामा के हमले की निंदा करे लेकिन अब वह पाकिस्तान के प्रति नरम रवैया अपना रहा है।

चुनावी राजनीति में उलझे भारतीय राजनेता पाकिस्तान के कूटनीतिक कदमों पर नजर नहीं रख सके। वे सिर्फ गाल बजाते रहे और पाकिस्तान को गीदड़ भभकी देते रहे। असलियत तो यही है कि अवाम अब समझने लगी है कि जो गरजने हैं वे बरसते नहीं। अब गरजने का अवसर चला गया।

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