‘संवेदनशील रुपाणी सरकार’? कातिल ठंडी के बीच इंसाफ की मांग करने वाली महिला खुले आसमान के नीचे सोने को मजबूर

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अपनी मांग को लेकर गुजरात के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाली महिला उम्मीदवार सत्याग्रह छावनी पहुंचकर पिछले एक सप्ताह से आंदोलन कर रही है. महिला आंदोलनकारियों को यथासंभव स्थानीय भीम आर्मी के युवाओं द्वारा सहायता कर रहे हैं. लेकिन सरकार ने मण्डप बांधने को लेकर परमीशन नहीं दिया,जिसकी वजह से इन महिला उम्मीदवारों को भयंकर ठंडी के बीच रात गुजारने को मजबूर होना पड़ रहा है.

गुजरात सरकार महिला सशक्तीकरण और संवेदनशील सरकार का अक्सर दावा करती है, लेकिन LRD परीक्षा को लेकर आंदोलन करने गांधीनगर आने वाली महिला उम्मीदवारों की जो तस्वीर सामने आ रही है उसे देखकर ऐसा लगता है कि गुजरात सरकार का महिला सशक्तिकरण का दावा झूठा साबित हो रहा है. एलआरडी परीक्षा को लेकर राज्य की राजधानी में आंदोलन करने आने वाली महिलाओं को भयंकर ठंडी के बीच गांधीनगर बस डिपो के अंदर खुले में सोने को मजबूर होना पड़ा.

इन महिला उम्मीदवारों की मदद करने के लिए वडोदरा की सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रिकाबेन सोलंकी गांधीनगर पहुंची हैं. उन्होंने इस सिलसिले में जानकारी देते हुए कहा कि, “ एस.सी. एस टी ओबीसी महिला को मिलने वाले आरक्षण के संवैधानिक अधिकार के लिए न्याय मांगने वाली महिलाओं को गांधीनगर में सत्याग्रह छावनी में पुलिस परमीशन नहीं मिलने की वजह से भयंकर ठंडी के बीच बस डिपो पर शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. गुजरात की एस सी एस टी ओबीसी महिलाओं को मिले संवैधानिक अधिकार को छीनने की कोशिश एक प्लान के तहत की जा रही है.इसीलिए इंंसाफ की मांग करने वाली बहनों और बेटियों को पिछले कई दिनों से भयंकर ठंड में रात गुजराने को मजबूर होना पड़ रहा है.

ऐसे में अब सरकार की नियत पर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या महिला सशक्तिकरण और संवेदनशीलता की बड़े-बड़े दावे सही मायने में झूठे साबित हो रहे हैं. इतना ही नहीं पीएम मोदी का वह दावा भी “पच्चीस पैसे का पोस्टकार्ड लिखना” भी एक जुमला ही साबित हो रहा है.

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